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हिन्दू राष्ट्र से डर कैसा ?

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लोक सभा के चुनाव जैसे जैसे पास आते जा रहे हैं , समाज के एक वर्ग को हिन्दू राष्ट्र के नाम पर डराने के प्रयास एक बार फिर तेज हो गये हैं ! कहा जा रहा है , कि यदि कोई दल विशेष सत्ता में आगया , या कोई व्यक्ति विशेष प्रधानमंत्री बन गया तो ,यह देश हिन्दू राष्ट्र बन जाये गा ! उस हिन्दू राष्ट्र के बड़े डरावने काल्पनिक चित्र प्रस्तुत किये जाते हैं ! यह ऐसे ही है जैसे कोई अल्पज्ञ और अपरिपक्व मां अपने बच्चों से अपने मन के अनुसार कार्य कराने के लिए , अथवा किसी कार्य से विमुख करने के लिए भूत का भय दिखाती है , और उस भूत का काल्पनिक डरावना चित्र अपने बच्चों के सामने प्रस्तुत करती है ! उस भूत का जिसको न उसने कभी देखा और न ही किसी अन्य ने ! वह इस बात की भी परवाह नहीं करती , की इस भूत के भय का बच्चों के मन मस्तिष्क पर क्या प्रभाव होगा ! उसका तो उद्देश्य मात्र बच्चों से तत्कालिक कार्य को सम्पन कराना ही होता है !

यह ही कार्य आज कल कुछ स्वार्थी , अदूरदर्शी दल और व्यक्तियों के समूह कर रहे हैं ! वह यह भी नहीं सोचते की , जिस प्रकार के हिन्दू राष्ट्र का डरावना चित्र वह प्रस्तुत कर रहे हैं , क्या वह भारत के पिछले पांच हजार साल के इतिहास में भी कभी संभव हो पाया है , अथवा भविष्य में भी क्या कभी वैसा संभव हो सकता है ? उनका तो उद्देश्य मात्र समाज के एक वर्ग को डरा कर उनके वोट प्राप्त करना है ! उनको इस बात की भी परवाह नहीं है की आने वाले समय में इसका समाज पर कितना घातक प्रभाव पढ़ेगा !

राजनीतिज्ञों का स्वार्थ तो समझ में आता है , परन्तु उन तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि के दिवालियेपन पर तरस आता है , जो इस प्रकार के अभियान में शामिल पाए जाते हैं ! उनको सोचना चाहिए कि यदि हिन्दू राष्ट्र से उनका तात्पर्य ‘ Theocratic State ‘, अर्थात ‘ धर्म आधारित राज्य ‘ से है , तो क्या यह कभी भूतकाल में भारत भूमि पर संभव हुआ है , या भविष्य में किस प्रकार संभव हो सकता है ! उनको मालूम होना चाहिए कि हिंदुत्व कोई धर्म नहीं है ! ( देखें हिंदुत्व क्या और हिन्दू कौन ? ) हिंदुत्व एक सकारात्मक विचारधारा है ! इसकी पुष्टि भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी अनेक बार अपनी टिप्पणीयों में कर चुका है ! जब हिंदुत्व कोई धर्म ही नहीं है , तो हिन्दू राष्ट्र एक Theocratic State कैसे हो सकता है ! हिन्दुओं में मूर्ति के उपासक भी हैं और मूर्ति पूजा के विरोधी भी ! हिन्दुओं में द्वैतवादी भी हैं और अद्वैतवादी भी ! हिन्दुओं में ईश्वरवादी भी हैं और अनीश्वरवादी भी ! हिन्दुओं में अनेकों इष्ट और अनेकों पूजा , उपासना एवं साधना पद्धतियाँ हैं ! इतनी विविधताओं वाले व्यक्तियों का समूह क्या कभी एक Theocratic State बन सकता है ?

‘ हिन्दू राष्ट्र ‘ शब्द का प्रयोग बीसवीं शताब्दी के दुसरे अथवा तीसरे दशक के पूर्व होता दिखाई नहीं देता ! इस शब्द की उत्पत्ति ‘ इस्लामिक राष्ट्र ‘ की प्रतिक्रिया में हुई प्रतीत होती है ! बिना इस पर विचार किये की , ‘ इस्लामिक राष्ट्र ‘ की तरह क्या हिन्दू राष्ट्र संभव है , और यदि वैसा राष्ट्र होगा भी तो उसका स्वरुप क्या होगा ! इस्लामिक राष्ट्र की रूपरेखा जिस सहिंता में निहित है , उसको धर्म ग्रन्थ की मान्यता प्राप्त है ! उसमें शासन की विधि , दंड , नियम , कानून , विधान आदि सब निर्धारित हैं ! इस लिए इस्लाम के अनुयाई अपने लिए उस प्रकार के शासन की आपेक्षा करते हैं ! इस आपेक्षा के ही सब्ज बाग दिखा कर मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के मुसलमानों को देश विभाजन के लिए उकसाया था ! जिसके कारण भारत के लाखों मुस्लमान अपना घर बार छोड़ कर इस मुगालते में पाकिस्तान गये थे , की यह उनकी हिजरत है , ( पैगम्बर मोहम्मद साहब ने मक्का से मदीना की हिजरत करी थी , और वहां इस्लामिक नियमों के अनुसार शासन की स्थापना की थी !) उनको आशा थी की पाकिस्तान इस्लामिक नियमों के अनुसार इस्लामिक देश बनेगा ! उसने अपने को इस्लामिक देश घोषित अवश्य कर दिया परन्तु वह आज तक इस्लामिक देश नहीं बन सका है ! वह तो मुस्लिम आबादी की बहुलता के कारण मात्र एक मुस्लिम देश है ! पाकिस्तान ही नहीं मुस्लिम बाहुल्य वाले अधिकतर देश मुस्लिम देश ही हैं ! इस्लामिक देश तो उँगलियों पर गिने जा सकने वाले चंद एक देश ही हैं !

इस्लामिक शासन की अवधारणा के कारण कुछ विद्वानों का मत है की ‘ इस्लाम के लिए भूमि आवश्यक है ‘ ! उनका विचार है की जिस स्थान पर भी इस्लाम के अनुयाई बहुसंख्यक हो जाते हैं , वह भूमि के उस हिस्से को इस्लामिक देश घोषित करने को तत्पर हो जाते हैं , अथवा घोषित कर देते हैं ! पाकिस्तान का निर्माण उनके इस विचार को बल प्रदान करता है ! परन्तु मौलाना वाहिदुद्दीन जैसे
भारतीय इस्लामिक विद्वान् इस विचार को सिरे से ख़ारिज करते हैं ! उनके अनुसार इस्लाम का भूमि अथवा शासन से कोई सम्बन्ध नहीं है !

हिन्दू विचारधरा में इस्लामिक शासन के समानं हिन्दू शासन का कोई शास्त्रीय आधार नहीं है ! यहाँ पर धर्म केवल व्यक्ति के आचरण को नियंत्रित करने और उसके व्यक्तित्व के उत्थान के लिए है ! धर्म क्या है ? इस को स्पष्ट करते हुए मनुस्म्रती में कहा गया है
धृतिः क्षमा दमोस्तेयं, शौचमिनिन्द्रयनिग्रहः ।
धीर्वीद्द्या सत्यमक्रोधो, दशक धर्म लक्षणम ।। “

अर्थात धैर्य , क्षमा , संयम , चोरी न करना , शौच ( स्वच्छता ) , इन्द्रियों को वश में रखना , बुद्धि , विद्या , सत्य का पालन करना और क्रोध न करना ! यह धर्म के दस लक्षण हैं ! तात्पर्य यह कि भारतीय परम्परा में धर्म नितांत व्यक्ति से ही सम्बंधित है ! धर्म के अंतर्गत कर्तव्यों का समावेश है ! तब ही तो कहा जाता है कि पुत्र धर्म , पितृ धर्म , मातृ धर्म , प्रजा धर्म , राज धर्म आदि आदि ! अर्थात पुत्र , माता , पिता , प्रजा और राजा आदि के क्या कर्तव्य हैं , उसको धर्म कहा गया है ! राजा के क्या कर्तव्य हैं , अर्थात राजा का क्या धर्म है ? इसका भारतीय वाग्मेय में अत्यंत स्पष्ट उल्लेख है !

महाभारत के शांति पर्व में कहा गया है :-
” यो रंजति प्रजान् सः राजा “
अर्थात जो प्रजा को सुखी रख सके , प्रजा का कल्याण कर सके , वह ही राजा कहला सकता है ! शुक्रनीति में राजा को युग प्रवर्तक कहा गया है :-
” युगप्रवर्तको राजा धर्माधर्मप्रशिक्षणात् । “
मनुस्मृतिकार राजधर्म को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं :-
” यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् ।
तथा सर्वाणि भूतानि विभ्रतः पार्थिवव्रतम ।। “

अर्थात पृथ्वी जिस प्रकार माता के समान अपने सभी बच्चों का समान रूप से ध्यान रखती है , उसी प्रकार राजा को भी समस्त जीवों का समान रूप से ध्यान रखना चाहिए !
रामचरित्रमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामराज्य का वर्णन करते हुए कहा है कि :-

दैहिक दैविक भौतिक तापा ! रामराज नहीं काहुहि व्यापा !!
सब नर करहीं परस्पर प्रीती ! चलहिं स्वधर्म निरत श्रुत निति !!

अर्थात रामराज्य में जन जन में आपस में प्रेम है और सब अपने अपने धर्म और नीति का पालन करते हैं ! राजधर्म की विशद व्याख्या में आचार्य चांणक्य का नाम प्रमुख है ! उन्हों ने भी कहीं पर भी राजा को धर्म के आधार पर भेदभाव करने अथवा उत्पीणन करने का निर्देश नहीं दिया है !

प्राचीन भारत में अधिकांश समय राजतन्त्र ही रहा है ! जिसमें अधिकतर अच्छे और योग्य एवं कुछ बुरे और अयोग्य शासक भी हुए ! परन्तु कहीं ऐसा उदाहरण नहीं मिलता कि किसी राजा ने अपनी प्रजा पर धर्म के आधार पर भेदभाव किया हो अथवा उत्पीणन किया हो ! किसी भी राजा ने धर्म के आधार पर अपनी प्रजा पर ‘ जजिया ‘ जैसा कोई कर भी कभी नहीं लगाया ! आजादी के बाद तक भारत के जम्मू और कश्मीर राज्य पर हिन्दू राजा का शासन था , जिसकी अधिसंख्य आबादी इस्लाम के अनुयाइयों कि है ! वहां पर भी कभी धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं हुआ ! यह बात दूसरी है कि हिन्दू राजा के शासन कि अनुपस्थिति में ही कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों को अपना घर बार छोड़ पलायन करने को विवश होना पड़ा ! इस प्रकार का पलायन किसी हिन्दू राजा के राज्य में कभी देखने में नहीं आया !

फिर किस हिन्दू राष्ट्र का भूत दिखा कर समाज के एक वर्ग को डराया जारहा है ! यह देश और हिंदुत्व के प्रति अपराध है !

मध्य काल में पश्चिम और मध्य एशिया से अनेक समुदाय आकर भारत भूमि पर बसे ! वह अपनी भाषा में देश को ‘ स्तान ‘ कहा करते थे , जो संभवत: ‘ स्थान ‘ शब्द का अपभ्रंश है ! जहाँ जिस समुदाय अथवा कबीले का बाहुल्य हुआ करता था ,वह उसको उसके स्तान के नाम से पुकारते थे ! जैसे तुर्क लोगों का देश तुर्किस्तान , अफगान लोगों का देश अफगानिस्तान , उजबेक लोगों का देश उज्बेकिस्तान , कज्जाक लोगों का देश कज्जाकिस्तान आदि आदि ! चूँकि भारत भूमि पर हिन्दू विचारधारा के लोगों का निवास था , इस लिए उन लोगों ने इस देश का नाम अपनी भाषा में हिंदुस्तान रखा ! हमको कोई आपत्ति नहीं है ! परन्तु यदि हम इसको अपनी भाषा में हिन्दू देश अथवा हिन्दू राष्ट्र कहें , तो किसी को क्यों कोई आपत्ति होनी चाहिए !

धर्म के आधार पर देश नहीं बना करते ! अगर ऐसा होता तो इस्लाम के अनुयाइयों के इतने सारे देश न होते ! देश बनते हैं सांस्कृति के आधार पर ! पाकिस्तान का निर्माण इस्लाम के आधार पर हुआ , परन्तु बांग्लादेश उससे टूट कर एक अलग देश बन गया ! जब की दोनों ही देशों में इस्लाम के अनुयाइयों का ही बाहुल्य है ! फिर वह क्यों दो अलग अलग देश बने ? क्यों की दोनों देशों की सांस्कृति अलग थी ! इस लिए वह एक देश के रूप में रह ही नहीं सकते थे ! हिंदुत्व का आधार मात्र धर्म नहीं सांस्कृति है ! भारतवर्ष सांस्कृति के आधार पर और जनसंख्या के अनुसार भी १५ अगस्त , सन १९४७ के पूर्व भी हिन्दू राष्ट्र था और उसके उपरांत आज भी यह हिन्दू राष्ट्र है ! जो कोई भी इस देश की समृध सांस्कृति का सम्मान करता है और इस देश को तहे दिल से प्यार करता है , उसका कोई भी धर्म अथवा उपासना पद्धति हो , उसको हिन्दू राष्ट्र से डरने की कोई आवश्कता नहीं है !

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 18, 2013

सुन्दर भाव , बधाई सादर मदन कभी इधर का भी रुख करें .

    Laticia के द्वारा
    October 17, 2016

    I thought I’d have to read a book for a dirocvesy like this!

Shiv Kumar Sharma के द्वारा
August 26, 2013

आदरणीय अनिल जी हिन्दुत्व की अति सुन्दर एवं वास्तविक व्याख्या की अपेक्षा आप जैसे वरिष्ठ लेखक एवं चिन्तक से ही की जा सकती है। राजनीतिक व्यक्ति तो इस हिन्दुत्व की रोटी खाकर सत्ता हासिल करने के लिए तमाम हथकंडे अपनाते है हिन्दुत्व का विरोध भी एक राजनीतिक हथकंडे से ज्यादा कुछ नहीं है. वास्तव में हिन्दू हो या मुसलमान सिख हो या सिन्धी हिन्दू राष्ट्रवादी भावनाओ के कारण ही सैकड़ो सालो से साथ रह पा रहे वरना राजनीतिक संकीर्णताओ के कारण सभी जातियों का खून तो इस देश की धरती पर गिरता ही रहता है उससे न हिन्दू बचा न मुसलमान न सिख।


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