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हिंदी सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्यधारा में अवश्य स्थापित हो सकती है - contest

Posted On: 11 Sep, 2013 Contest,Hindi Sahitya,Others में

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हाँ , आजादी के इतने वर्षों उपरांत देश में हिंदी का जो स्थान होना चाहिए था , वह नहीं है I इसके लिए यदि कोई जिम्मेदार है , तो हम स्वयं हिन्दीभाषी लोग हैं I जब देवनागरी लिपि में हिंदी राजभाषा के रूप में स्वीकृत हो गयी , तब हमने मान लिया कि अब अहिन्दीभाषी लोगों कि जिम्मेदारी है , कि वह हिंदी सीखें और सरकार की जिम्मेदारी है कि उनको हिंदी सिखाये I डा० चंद्रशेखर नायर , डा० रांगेय राघव , एम० वी० जम्बुनाथन , महीप सिह जैसे अहिन्दीभाषी साहित्यकारों को हिंदी में लिखते देख कर प्रसन्न होते रहे , कि हिंदी का प्रसार हो रहा है I मणिशंकर अय्यर , सुब्रामणियम स्वामी , चामलिंग जैसे अहिन्दीभाषी राजनेताओं को हिंदी में धाराप्रवाह भाषण देते देखकर खुश होते रहे कि हिंदी आगे बढ़ रही है I परन्तु कितने हिन्दीभाषी साहित्यकारों ने हिंदीतर किसी भरतीय भाषा में साहित्य रचा I किसी हिन्दीभाषी राजनेता ने क्या कभी किसी दक्षिण भारतीय भाषा में धाराप्रवाह भाषण दिया ? यदि नहीं तो क्यों ? ताली एक हाथ से नहीं बजती I क्या यह सब भाषाएँ हमारे देश कि अपनी भाषाएँ नहीं हैं ? जब हम देश की अन्य भाषाओँ को अपना जैसा प्यार और सम्मान नहीं देंगे , तब दूसरों से कैसे आपेक्षा की जा सकती है की वह हिंदी को वैसा ही सम्मान दें I

यदि हिंदी को सम्मानजनक भाषा के रूप में स्थापित करना है , तो हम हिंदीभाषियों को किसी अन्य एक भारतीय भाषा को सिखने का संकल्प लेना होगा I ऐसा कर पाना कतई कठिन नहीं है I जब एक माह में अंग्रेजी बोलना सिखने के दावे किये जा सकते हैं , तो एक माह न सही , छ: माह अथवा एक वर्ष में हम अपने ही देश की एक अन्य भाषा बोलना क्यों नहीं सीख सकते ? सोनिया गाँधी विदेशी भाषाभाषी होकर हिंदी बोल सकती हैं , तो हम भारतीय होकर अपने ही देश की एक अन्य भाषा क्यों नहीं बोल सकते ? एक विदेशी भाषा अंग्रेजी में ‘ मालगुडी डेज ‘ जैसी रचना रची जा सकती है , तो ऐसीही कोई रचना किसी भारतीय द्वारा हिंदी में क्यों नहीं संभव है ? अवश्य संभव है , यदि हम हिंदीभाषियों में प्रबल इच्छाशक्ति हो और सब सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थाएं मिलकर इस कार्य को मिशनरी भाव से करें I

भाषा के द्रष्टिकोण से दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण हैं , अतः हमलोगों को इन क्षेत्रों की भाषाओँ पर प्राथमिकता के आधार पर कार्य करना चाहिए I कालांतर में शेष भारत को क्रमबद्ध रूप से इसमें शामिल किया जा सकता है I

पूर्वोत्तर भारत के सम्बन्ध में मैं कुछ विशेष तथ्य रखना चाहूँगा I पूर्वोत्तर भारत में गारो , खासी , कुकी , मिजो , नागा , भोटिया , लेप्चा आदि अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं I इनकी भाषाओँ की अपनी कोई लिपि नहीं है I वह मात्र वाचिक परम्परा से अबतक अपना आस्तित्व बनाये हुए हैं I ब्रिटिश शासनकाल में ईसाई मिशनरियों ने इनकी बोलियों को रोमन लिपि देने के साथ ही ईसाई धर्मग्रन्थों को जनजातीय बोलियों में , रोमन लिपि के माध्यम से प्रस्तुत किया I जिससे वहां बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ , और परिणामस्वरूप आज वहां अलगाववाद का बोलबाला है I

वर्तमान में वहां की अधिकांश भाषाएँ रोमन लिपि में , और चंद कुछ भाषाएँ असमिया एवं बांग्ला लिपि में लिखी जा रही हैं I एक मात्र बोडो भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जा रही है I कितने हिन्दीभाषी जानते हैं कि , बोडो भाषा के लिए रोमन लिपि का विरोध करने के कारण माननीय विनेश्वर ब्रह्म १९,अगस्त २००० को शहीद कर दिए गये थे I वह बोलियाँ जो रोमन लिपि में लिखी जा रही हैं , उनको देवनागरी लिपि देने के प्रयास प्राथमिकता के आधार पर सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा संयुक्त रूप से होना चाहिए I देवनागरी लिपि ध्वन्यात्मक है और इसमें स्वर एवं व्यंजन वर्णों कि संख्या रोमनलिपि से अधिक है I इसलिए उन जनजातीय बोलियों कि विशिष्ट ध्वनियों के साथ जो न्याय देवनागरी लिपि कर सकती है , वह रोमनलिपि कभी नहीं कर सकती I इसके साथ ही इससे जनजातीय समुह देश कि मुख्यधारा से जुडेगें , उनमें आपस में एकत्व बोध होगा जिससे अलगाववादी भावना पर विराम लगेगा I इन प्रयासों से हिंदी के साथ साथ वह सब भाषाएँ भी समर्द्ध होंगी I

आज हिंदी साहित्य का रचनालोक मात्र हिन्दीभाषी क्षेत्र तक ही सिमित है I ‘ तुंगभद्रा पर सूर्योदय ‘ , ‘ रेगिस्तान ‘ जैसी चंद रचनाओं के अतिरिक्त , कहीं शेष भारत कि झलक दिखाई नहीं देती I यदि हम हिन्दीभाषी , और विशेषकर हिंदी के साहित्यकार दृढ निश्चय करें तो हिंदी साहित्य कि विभिन्न विधाओं में हिंदीतर भारत की कला , सांस्क्रति और इतिहास वर्णित होगा I वहां के गाँव , नगर की परम्पराएं अभिव्यक्त होंगी , वहां की अभिनव प्रकृति चित्रित होगी , तब हिंदी में सम्पूर्ण भारत बोल उठेगा I जब हिंदी में सम्पूर्ण भारत बोलेगा , तब सम्पूर्ण भारत हिंदी बोलेगा I जब सम्पूर्ण भारत हिंदी बोलेगा , तब हिंदी को सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्यधारा में स्थापित होने से कोई रोक नहीं सकेगा I

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

udai shankar srivastava के द्वारा
September 15, 2013

बहुत ही नये विचारों के साथ लेख लिखा है । साधुवाद ।

    anilkumar के द्वारा
    September 16, 2013

    प्रिय उदय शंकर जी , ब्लाग पर आपका स्वागत है । विचारों का समर्थन करने के लिये धन्यवाद ।

meenakshi के द्वारा
September 15, 2013

“जब सम्पूर्ण भारत हिंदी बोलेगा , तब हिंदी को सम्मानजनक भाषा के रूप में मुख्यधारा में स्थापित होने से कोई रोक नहीं सकेगा ई” – अनिल जी आपकी इन पंक्तियों में बिलकुल सत्य बात कही गयी है, बधाई हो ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

    anilkumar के द्वारा
    September 16, 2013

    आदर्णीय मीनाक्षी जी , आप ने मेरे ब्लाग पर आ कर मेरे विचारों से सहमति व्यक्त की । आपका  बहुत बहुत आभार । 

jlsingh के द्वारा
September 15, 2013

आदरणीय अनिल कुमार जी, बिलकुल नई सोच के साथ आपका आलेख मेरी नजर में काफी महत्वपूर्ण है … निश्चित ही हम सबको भारत की दूसरी भाषा सीखने में रूचि जगानी होगी और अहिन्दी भाषी को अपने साथ लाना होगा ताली दोनों हाथों से बजती है और तभी हम एकाकार होते हैं … बहुत सुन्दर विचार रखने के लिए आपका हार्दिक आभार!

    anilkumar के द्वारा
    September 16, 2013

    प्रिय जवाहरलाल जी , मेरे लेख पर आपकी नजर , काफी महत्वपूर्ण है । विचारों के समर्थन के लिये धन्यवाद ।

    Margie के द्वारा
    October 17, 2016

    Th’tas the best answer of all time! JMHO

Bhagwan Babu के द्वारा
September 15, 2013

बिल्कुल सही कहा आपने…

    anilkumar के द्वारा
    September 16, 2013

    प्रिय भगवान बाबू , धन्यवाद ।

deepakbijnory के द्वारा
September 15, 2013

positive approach nice

    anilkumar के द्वारा
    September 16, 2013

    My dear Deepakji , welcome on my blog , and thanks for your comment .

seemakanwal के द्वारा
September 14, 2013

SARTHAK AUR SASHKT LEKH ,ABHAR

    anilkumar के द्वारा
    September 16, 2013

    आदर्णीय सीमा जी , ब्लाग पर आपका स्वागत है । लेख पर सकारात्मक टिप्पणी के लिये धन्यवाद ।

Pradeep Kesarwani के द्वारा
September 11, 2013

यदि हम हिन्दीभाषी , और विशेषकर हिंदी के साहित्यकार दृढ निश्चय करें तो हिंदी साहित्य कि विभिन्न विधाओं में हिंदीतर भारत की कला , सांस्क्रति और इतिहास वर्णित होगा I वहां के गाँव , नगर की परम्पराएं अभिव्यक्त होंगी , वहां की अभिनव प्रकृति चित्रित होगी , तब हिंदी में सम्पूर्ण भारत बोल उठेगा ,…. बिलकुल सही कहा आपने बिना दृढ संकल्प करे किसी भी कार्य को सही अंजाम तक नही लाया जा सकता विशेसकार जब उसको दृढता की जरूरत हो तब और भी …. सुंदर लेख बधाई !!!

    anilkumar के द्वारा
    September 16, 2013

    प्रिय प्रदीप जी , ब्लाग पर आपका बहुत बहुत स्वागत , और लेख से सहमती के लिये आभार ।


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