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सम्भावनाओं से समाधान तक

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वह कुछ पल

Posted On: 20 Jan, 2014 Others,Contest,Hindi Sahitya में

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बालपन से ही भूतों की चर्चाएं सुन सुन कर किशोर हुआ था | कभी सहपाठियों से तो कभी बड़ों से | अतः भूतों के विषय में उत्सुकता भी थी , भय भी था और संदेह भी था | उत्सुकता थी कि किसी भूत को साक्षात् देखूं | भय था कि यदि ऐसा हुआ , तब क्या होगा | संदेह था कि भूत होते भी हैं या नहीं | एक ओर भूतों के आस्तित्व कि सत्य कथाएँ और विश्वासपूर्ण आख्यान ,भूतों के आस्तित्व को स्वीकारने को विवश करते थे | वहीं दूसरी ओर पत्र पत्रिकाओं में यदा कदा यह भी पढ़ने को मिलता था कि कुछ अराजकतत्व , तस्कर एवं डकैत आदि , किसी वीरान खंडहर में अपने असमाजिक कार्यों को अंजाम देने के लिए ,भूतों की अफवाह , भ्रम अथवा स्वांग का सुरक्षा कवच रचते हैं | यह सब भूतों के आस्तित्व को नकारने को प्रेरित करता था | परिणामस्वरूप भूतों के विषय में संदेह और घनीभूत होता जा रहा था | एक दिन अपनी माँ से मैने पूछा था ,
अम्मा , क्या भूत सच में होते हैं ?
माँ ने अतयंत ईमानदार उत्तर दिया था ,
बेटा ! मैने सुना तो है की भूत होते हैं , परन्तु ठीक से नहीं कह सकती की भूत होते हैं या नहीं |
अम्मा , क्या तुमने कभी भूत देखा है ? मैने पूछा |
नहीं | माँ ने कहा |
अम्मा , क्या तुमसे कभी कोई ऐसा व्यक्ति मिला , जिसने भूत देखा हो ?
नहीं , पर कई लोग ऐसे मिले जो यह तो कहते थे , कि वह उन लोगों को जानते हैं , जिन्हों ने भूत देखा है | पर कोई ऐसा नहीं मिला , जिसने कहा हो कि हाँ मैने भूत देखा है |

मेरी भी स्थिति तो ऐसी ही थी | इस स्थिति में और माँ के ईमानदार वक्तव्य ने , भूतों के आस्तित्व को नकारने के विश्वास को सुदृढ़ तो किया , परन्तु संदेह तो फिरभी विद्मान रहा |
ऐसी ही मनःस्थिति में , जब मैं हाई- स्कूल का छात्र था , मेरी पूज्य दादीमां का स्वर्गवास हो गया | दीर्घ काल से वह जिस कमरे मेँ रह रहीं थीं , वह अब खाली था | परिवार वालों ने , हाई-स्कूल कि पढ़ाई को महत्वपूर्ण मान , वह कमरा मुझको देने का निर्णय किया | माँ ने पूछा था ,
बेटा ! इसमें डरोगे तो नहीं ?
मैं माँ का आशय समझ गया | किशोर वय का प्रभाव था , या मेरा अब तक का विश्वास | तपाक से कहा ,
नहीं ! बिलकुल नहीं !! कैसा डर !!!
घर वाले मेरे आत्मविश्वास से प्रभावित हुए , और उस कमरे मेँ मेरे रहने , पढ़ने एवं सोने की व्यवस्था कर दी गयी | कमरा पहली मंजिल पर घर के पृष्ठ भाग में था | उसके पीछे पार्क था | कमरे कि खड़की पार्क की ओर खुलती थी | उसी खड़की के आगे मेरी मेज , कुर्सी लगा दी गयी , और मुझको रात में देर तक पढ़ने की अनुमति भी प्राप्त हो गयी |

जाड़े की एक रात थी | कड़ाके की ठंड में , मैं गर्म वस्त्रों और कंबल में आवर्त , अपनी मेज कुर्सी पर बैठा , अध्ययन में तल्लीन था | ठंड के कारण , सामने की खिड़की और पीछे का दरवाजा भी बंद कर लिया था | चारो ओर नीरव शांति का साम्राज्य था | ऐसे में अचानक ‘ खड़ ‘ की मद्दिम सी ध्वनि | सोचा कोई मूषक होगा | परन्तु ‘ खड़ खड़ ‘ की ध्वनि निरंतर और स्पष्ट होने लगी | वह भी नीचे फर्श पर नहीं , ऊपर हवा में | सतर्क हुआ | दृष्टि ऊपर उठाई और ध्वनि का स्रोत खोजने लगा | पाया , सामने खड़की पर लगी सिटकनी से वह ध्वनि उत्पन्न हो रही थी | सिटकनी ऊपर चढ़ी नहीं थी | नीचे अपने अवलम्ब पर टिकी कम्पन्न कर रही थी | दृष्टि और ऊपर उठी | खड़की के ऊपर दीवार पर लगी घड़ी तक | रात के बारह बज रहे थे | तन सिहर उठा | यह क्या हो रहा है ? सिटकनी अपने आप आप कैसे हिल रही है ? कही कोई अन्य हलचल भी नहीं | क्या यह भूत की करामात है ? क्या वह मेरे सामने प्रकट होगा ? तब ही वह ‘खड़ खड़’ की ध्वनि तीव्र से तीव्रतर होने लगी | भय अब मुझको अपने आलिंगन में लेता जा रहा था | किशोर वय का आत्मविश्वास और परिवार को दिया आश्वासन , मेरे साहस को बैसाखियां लगाने का प्रयत्न कर रहे थे | साहस ने जोर मारा कि चलो आज देख ही लिया जाये ,कि भूत कैसा होता है | परन्तु भय था कि पराजित होने का नाम ही नहीं ले रहा था | मैं कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया | सिटकनी अब मुझको स्पष्ट रूप से कम्पन्न करती दिखाई दे रही थी | साहस ने फिर ललकारा , ‘ पकड़ ले सिटकनी को | देखते हैं क्या होता है ? ‘ मैं फुर्ती से कुर्सी पर चढ़ गया | एक पैर मेज पर रख कर , सिटकनी की और हाथ बढ़ाया | तब ही भय ने कड़क चेतावनी दी , ‘ छूना मत इसको ‘ | मैं जिस फुर्ती से ऊपर चढ़ा था उसी फुर्ती से नीचे उतर आया | साहस ने धीमे से सांत्वना दी , ‘ देखता रह , आखिर कब तक हिलेगी यह ‘ |

तब ही दाहिनी ओर दूर क्षितिज से धड़-धड़ ! धड़-धड़ !! धड़-धड़ !!! कि ध्वनि सुनाई देने लगी | वह अतयंत तीव्र गति से मेरी ओर आ रही थी | मैं चकित सा , आँखें फाड़े , कमरे मैं चारो ओर देखने लगा | मेरा शरीर थर-थर कांप रहा था | तब ही एक तीखी कू !—-उ !!——-उ !!!———- की ध्वनि , जैसे मस्तिष्क को चीरती हुई निकल गयी | मुख से एक चीख निकलते निकलते रह गयी | मस्तिष्क सुन्न हो गया था | कमरे की प्रत्येक वस्तु घूमती दिखाई दे रही थी | साहस ने किसी भांति मेरे होशो – हवास को सम्हाले रखा | अब वह ध्वनि बायीं ओर झग-झग !!! झग-झग !! झग-झग करती दूर क्षितिज मैं विलीन हो रही थी | कुछ पलों मेँ समस्त ध्वनियां शांत हो गयीं | सिटकनी भी अब पूर्ववत स्थिर और शांत थी | उस कड़क ठंडी रात मेँ , मैं पसीने से तर- बतर अपने पलंग पर बैठा था |

साहस मन मस्तिष्क को सहला कर धीरे धीरे पूर्ववत लाने का प्रयास कर रहा था | मन शैनः शैनः शांत हुआ | मस्तिष्क फिर से सोचने , समझने की स्थिति में आया और बीती घटना का विश्लेषण करने लगा | याद आया , घर के पीछे , लगभग एक फर्लांग दूर रेलवे लाइन है | जिस पर रात के बारह बजे ,नित्य एक ट्रेन गुजरती थी | यह वह ही ट्रेन तो थी , जो अभी अभी गुजरी थी | परन्तु वह सिटकनी कम्पन्न क्यों कर रही थी ? याद आया , भौतिक विज्ञानं की पुस्तक में ध्वनि का अध्याय | याद आया , भौतिक विज्ञानं के गुरुजी द्वारा दिया गया व्याख्यान , जिस में उन्हों ने बताया था कि ‘ ट्रेन के तीव्र गति से चलने पर , मीलों दूर तक की पटरियों में कम्पन्न उत्पन्न होता है , जिसको पटरी पर कान लगा कर अनुभव किया जा सकता है | यह कम्पन्न वायु ,गैस अथवा वातावरण के माध्यम से दूर दूर तक प्रेषित होते हैं | दूर स्थित किसी वस्तु की आवृति [ Frequency - समय की एक निश्चित इकाई में किसी वस्तु अथवा पदार्थ की दोलन संख्या को उसकी Frequency अर्थात आवृति कहते हैं ] किसी स्रोत वस्तु के आवर्त्तन से ,संयोग वश , अथवा सप्रयास एक समान हो जाये , तो वह वस्तु भी उसी गति में कम्पन्न करने लगती है ‘ | अब समझ में आ रहा था कि सिटकनी में कम्पन्न क्यों थे |अब मन मस्तिष्क और शरीर सभी प्रकार के तनावों से मुक्त हो चुके थे | में स्वयं अपने ऊपर हंस पड़ा | क्यों ? उस हंसी में एक झेप भी थी और एक विजय का भाव भी | एक संदेह पर निर्णायक विजय का भाव | अपने विश्वास और परिवार को दिए आश्वासन की जीत की प्रसन्नता थी | प्रसन्नता थी कि मेरी स्वर्गवासी पूज्य दादी जी , किसी सम्भावित अपयश से बच गयी थीं |

आज उस अनुभव को लिखने अथवा वर्णन करने में पर्याप्त समय लगता है , परन्तु वह सब घटा कुछ पलों में ही था | आज उन पलों को याद करता हूँ , तो सिहरन भी होती है और रोमांच भी | आज जब चिंतन मनन करता हूँ , तो पता हूँ कि वह कुछ पल मुझको कितना कुछ सिखा गये |

उन पलों से मैने भूतों के आस्तित्व की तार्किक अस्वीकृति सीखी | अब मैं जानता हूँ , कि किसी को भूत क्यों और कैसे दिखाई देते हैं | जब किसी प्रकार का अथवा अनेक प्रकार के भय घनीभूत हो कर मनुष्य के सुसुप्त मस्तिष्क एवं अंतःकरण मैं कहीं गहरे अवस्थित हो जाते हैं , वह ही भय मनुष्य के किन्हीं अति दुर्बल मानसिक पलों में , विभिन्न आकार ले कर प्रकट हो सकते हैं | जिनको लोग भूत समझते हैं |

उन पलों से मैने सीखा , कि तानसेन जब गाते थे , तब उनके पास रखे वाद्य यंत्रों का स्वतः ही बज उठना , मिथ नहीं सत्य था | यदि वाद्य यंत्रों को गेय स्वरों की आवृति में ट्यून किया जाये , तो यह सम्भव है | केवल दो तार ही क्यों , किन्हीं दो ह्रदयों की तंत्रिकाएं भी यदि एक ही आवृति में ट्यून होजाएं , तो वह भी एक साथ ही झंकृत होती हैं |

बहुत समय पूर्व स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी की जीवनी पढ़ते समय , उसमें वर्णित एक घटना याद आ रही है | एक दिन स्वामी जी ने देखा , कि एक व्यक्ति दूसरे को कोड़ों से मार रहा है | यह देख स्वामी जी की पीठ पर कोड़ों के प्रहार की लाल रेखाएं उभर आई थीं | तब मैने सोचा था , ऐसा सम्भव नहीं हो सकता |
यह लेखक की श्रद्धा का अतिरेक है , या किसी भक्त की भावनाओं की अतिश्योक्ति | आज उन कुछ पलों के परिपेक्ष में सोचता हूँ , तो विश्वास जगता है , कि ऐसा सम्भव हो सकता है | जब किसी व्यक्ति की संवेदनाओं का आवर्त्तन , किसी अन्य मनुष्य अथवा जीव की संवेदनाओं के अनुरूप हो जाता है , तब यह व्यक्ति , उस अन्य व्यक्ति अथवा जीव के सुख या पीड़ा से आनंदित अथवा व्यथित होता है | इस ही प्रकार जब किसी व्यक्ति की संवेदनायों के सपंदन , समस्त सृष्टि की संवेदनाओं के सपंदनों के साथ एकाकार हो जाते हैं , तब उस स्थिति को ही निर्वाण कहते हैं , और जो व्यक्ति उसको प्राप्त करता है , वह बुद्ध हो जाता है |

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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
July 3, 2014

अद्भुत वर्णन,बहुत अच्छी हिन्दी.बहुत रोचक और शिक्षाप्रद कहानी.सादर आभार और बधाई आदरणीय.

sadguruji के द्वारा
January 28, 2014

जब किसी व्यक्ति की संवेदनाओं का आवर्त्तन , किसी अन्य मनुष्य अथवा जीव की संवेदनाओं के अनुरूप हो जाता है , तब यह व्यक्ति , उस अन्य व्यक्ति अथवा जीव के सुख या पीड़ा से आनंदित अथवा व्यथित होता है | इस ही प्रकार जब किसी व्यक्ति की संवेदनायों के सपंदन , समस्त सृष्टि की संवेदनाओं के सपंदनों के साथ एकाकार हो जाते हैं , तब उस स्थिति को ही निर्वाण कहते हैं , और जो व्यक्ति उसको प्राप्त करता है , वह बुद्ध हो जाता है | संस्मरण की ये पंक्तियाँ अच्छी लगी.इसके लिए बधाई.जहांतक प्रेतों कि बात है तो निसंदेह उनका अस्तित्व है,मैंने उन्हें देखा है और वो भी जीवन के उस काल में जब मैं नास्तिक था और कम्युनिस्ट विचारधारा को मानता था.प्रेत होते हैं,ये बात अलग है कि कोई उन्हें देख पता है और कोई नहीं देख पाता.तुलसीदास जी को भी प्रेतों के दर्शन हुए थे और कई संतों को मैं भूत-प्रेतों से काम लेते देखा.कांटेस्ट के लिए मेरी शुभकामनायें.

    anilkumar के द्वारा
    February 1, 2014

    आदरणीय सदगुरू जी , प्रणाम । इस संस्मरण की कुछ पंक्तियां आप को अच्छी लगी , यह मेरा सौभाग्य है ।  शेष मेरा अनुभव है । व्यक्ति व्यक्ति के अनुभव भिन्न भिन्न होते ही हैं । ब्लाग पर पधार ने और  शुभकामनाओं के लिये आभार ।

jlsingh के द्वारा
January 26, 2014

आदरणीय अरुण जी, सादर अभिवादन! बहुत ही सुन्दर तरीके से आपने भय भूत, मनोविज्ञान, भौतिक विज्ञानं, आध्यत्म सब कुछ सिखा दिया ..बहुत ही सुन्दर! वैसे भूतों के बारे में मेरा भी वही सोच और अनुवहाव है जो आपने महसूस किया है सादर!

    anilkumar के द्वारा
    January 27, 2014

    प्रिय जवाहर लाल जी , आपको को भय भूत मनोविज्ञान आध्यात्म की मसाला चाट स्वदिष्ट लगी । बहुत बहुत धन्यवाद ।

yatindrapandey के द्वारा
January 25, 2014

सुन्दर लेखनी

    anilkumar के द्वारा
    January 27, 2014

    प्रिय यतीन्द्र जी , विचाराभिव्यक्ति के लिये धन्यवाद ।

    Jera के द्वारा
    October 17, 2016

    Woot, I will cenltiray put this to good use!

yogi sarswat के द्वारा
January 25, 2014

उन पलों से मैने भूतों के आस्तित्व की तार्किक अस्वीकृति सीखी | अब मैं जानता हूँ , कि किसी को भूत क्यों और कैसे दिखाई देते हैं | जब किसी प्रकार का अथवा अनेक प्रकार के भय घनीभूत हो कर मनुष्य के सुसुप्त मस्तिष्क एवं अंतःकरण मैं कहीं गहरे अवस्थित हो जाते हैं , वह ही भय मनुष्य के किन्हीं अति दुर्बल मानसिक पलों में , विभिन्न आकार ले कर प्रकट हो सकते हैं | जिनको लोग भूत समझते हैं | उन पलों से मैने सीखा , कि तानसेन जब गाते थे , तब उनके पास रखे वाद्य यंत्रों का स्वतः ही बज उठना , मिथ नहीं सत्य था | यदि वाद्य यंत्रों को गेय स्वरों की आवृति में ट्यून किया जाये , तो यह सम्भव है | केवल दो तार ही क्यों , किन्हीं दो ह्रदयों की तंत्रिकाएं भी यदि एक ही आवृति में ट्यून होजाएं , तो वह भी एक साथ ही झंकृत होती हैं | सही और गलत में भेद कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है ! किन्तु जब प्रत्यक्ष होता हो तो हमारा दर दूर हो जाता है ! बढ़िया संसमरण लिखा है आपने !

    anilkumar के द्वारा
    January 27, 2014

    प्रिय योगी जी , लेख पर सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने हेतु आभार ।

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
January 25, 2014

सुन्दर संस्मरण / कांटेस्ट के लिए मेरी ओर से शुभकामनाएँ /

    anilkumar के द्वारा
    January 27, 2014

    प्रिय राजेश जी , ब्लाग पर आपका स्वागत है । विचारों और शुभकामनाओं के लिये धन्यवाद ।

vaidya surenderpal के द्वारा
January 24, 2014

आ. अनिल कुमार जी !मन की भावनाओं को उद्वेलित करते सुन्दर आलेख के लिए बधाई ।

    anilkumar के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीय वैद्य सुरेन्द्रपाल जी , लेख आपके मन को भाया यह मेरा सौभाग्य है । बहुत बहुत आभार ।

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 21, 2014

आदरणीय अनिल जी ! सादर !.. बहुत ही उम्दा आलेख , भाव -भाषा और शब्द-सामर्थ्य से परिपूर्ण ! बधाई !

    anilkumar के द्वारा
    January 22, 2014

    आदरणीय आचार्य जी , लेख पर आपके विचारों के आशीर्वचन मेरे लेखन सामर्थ्य के उत्थानक है ।  बहुत बहुत आभार ।

Santlal Karun के द्वारा
January 20, 2014

आदरणीय अनिल कुमार जी,  यह संवेदना और शिल्प दोनों से भली-भाँति गठित उच्च कोटि का संस्मरण है | यह विचारप्रधान, संदेशपरक और अत्यंत पठनीय है | .. हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    anilkumar के द्वारा
    January 21, 2014

    आदरणीय संतलाल जी , लेख पर आपके विचारों ने , मेरे लेख को अधि मूल्यित कर दिया है ।  बहुत  बहुत धन्यवाद ।

ranjanagupta के द्वारा
January 20, 2014

आदरणीय अनिल जी !सादर !आपका संस्मरण बेहद रोमांचक था !बहुत ही मन आश्वस्त हुआ मुझे अपने प्रश्नों का भी उत्तर मिला ,अंतिम पंक्तियाँ इसी प्रकार जब किसी ..वह बुद्ध हो जाता है !बहुत उच्च कोटि का ज्ञान है !आखिर मेरा मन क्यों दुसरो के दुःख चाहे वह कोई भी जीव हो ,उससे इतना घनी भूत होता है ,वह पीड़ा अपनी लगती है ! बहुत बहुत बधाई !!

    anilkumar के द्वारा
    January 21, 2014

    आदरणीय रंजना जी , आपने मेरे लेख में कुछ सार खोज कर , मेरे लेख को सार्थक कर दिया । बहुत बहुत आभार ।


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