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सम्भावनाओं से समाधान तक

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वह आ रहे हैं

Posted On: 26 Jan, 2014 Others,Contest,Politics,Hindi Sahitya में

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दुहाई है महाराज . मैं सपत्नी तीर्थयात्रा को जा रहा था . राज्य सीमा पर कर-अधिकारी ने उत्कोच में सौ स्वर्णमुद्राएं लेलीं . राज्य में वन से गुजरते दस्युओं ने शेष धन लूट लिया . राजधानी श्रावस्ती में लम्पटों ने मेरी सुंदर , सुशील पत्नी का अपहरण कर लिया . मैं एक साँस में सब बोल गया . महाराज कुछ कहें , इसके पूर्व ही प्रतिहारी ने प्रवेश कर ,कहा
‘ महाराज ! वह आ रहे हैं . ‘
‘ चलो ! सब चलो !! ‘ महाराज प्रसेनजित बोले . .
आमात्य ने धीमे से कहा ,
‘ युवराज को आगे रखकर जाइयेगा ‘
और सब वहाँ से प्रस्थान कर गये .
बाहर आकर देखा . एक गम्भीर और उत्साह से परिपूर्ण व्यक्ति , उसके पीछे सन्यासियों का समूह एवं जनसामान्य की विशाल भीड़ . उसने महल पर अर्थपूर्ण दृष्टि डाल , अनुयाइयों को ललकारा
‘ चलो ! वह आ रहे हैं ‘ और सब आगे बढ़ गये .
‘ यह दुष्ट कौन है ? ‘ पास खड़े धर्माचार्य ने शिष्य से पूछा ,
‘ भंते ! भृगुकच्छ जनपद के प्रतिनिधि हैं यह . ‘

कुछ कालोपरांत , लम्पटों के झुण्ड . दस्युओं के गिरोह . भ्रष्ट अधिकारीयों के समूह , सब शुभवस्त्रावर्त , यह ही गुहार लगते चले जारहे थे ,
‘ चलो , वह आ रहे हैं ….. ‘

कुछ समझ ना पाया . चलते चलते , सरयू तट पर , एक अवधूत , भवावेशित अवस्था में और उसको घेरे कुछ मनुष्य दिखे . पूछा तो ज्ञात हुआ कि देवी का अवतरण हुआ है . अब यह त्रिकालदर्शी हैं . सब कुछ बता सकते हैं .

मैं तत्काल नतमस्तक हुआ और अपनी समस्त व्यथाएं व्यक्त कर दीं .
वह चीखा , ‘ नहीं ! यह कौशल महाजनपद , श्रेठ गणराज्य , यहाँ यह सब कदापि सम्भव नहीं . ‘
‘ यह यथार्थ है , महात्मन . ‘
उसने लाल ऑंखें खोल , कुछ पल मेरी आँखों मैं घूरा . फिर बोला ,
‘ अरे ! तू इक्कीसवीं शताब्दी का मानव . ढाई हजार वर्ष पीछे आगया . यह सब घटनाएं तेरे युग की हैं . देख , संदर्भ परिवर्त्तन से वक्तव्य के अर्थ परिवर्तित हो जाते हैं , और युग परिवर्त्तन से घटनाओं के संदर्भ परिवर्तित हो जाते हैं . ‘ फिर ,अंगूठे से उसने मेरी भृकुटियों के मध्य दबाया . आँखों के समक्ष अंधकार छा गया . उसकी वाणी गूंजी ,
‘ ऑंखें खोल ! देख आकाश में , अपने युग का सत्य ‘
मैने देखा , अनेक शिष्ट , वशिष्ट , अशिष्ट सब रंगबिरंगी टोपियां लगाये भाग रहे हैं . दूर कहीं से मंद ध्वनि आ रही है ,
‘ कोई हिंसा नहीं , सब शंतिपूर्वक …………. ‘
‘ क्या तथागत आरहे हैं ? ‘ मैं बुदबुदाया ,
‘ नहीं ! उधर देख , वह आ रहे हैं . ‘
मैने देखा हवा में तैरती एक लिखावट आ क्षितिज पर छा गयी ,
‘ लोकसभा चुनाव २०१४ ‘
‘ अब तू समझा ‘ और कंधे पर चिमटे का प्रहार .
अचकचा कर आँख खुल गयी . देखा सामने पत्नी खड़ी थी , बोली ,
‘ उठिए , आज गणतंत्र दिवस है . ‘

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19 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
July 3, 2014

वाह आदरणीय.रचना पर मैं नतमस्तक हूँ.

    Finch के द्वारा
    October 17, 2016

    If you’re reading this, you’re all set, paenrdr!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
February 3, 2014

वाह आदरणीय अनिल जी वाह ! मन गदगद हो आनंदातिरेक में डूब सा गया ! सादर बधाई !!

yogi sarswat के द्वारा
January 29, 2014

यथार्थ और सार्थक लेखन श्री अनिल कुमार जी !

    anilkumar के द्वारा
    February 1, 2014

    आदरणीय योगी जी , कथा में व्यक्त विचारों के समर्थन के लिये आभार ।

yatindrapandey के द्वारा
January 28, 2014

यथार्थ लेखनी

    anilkumar के द्वारा
    February 1, 2014

    प्रिय यतीन्द्र जी , प्रतिक्रिया के लिये धन्यवाद ।

nishamittal के द्वारा
January 27, 2014

वाह बहुत बढ़िया अनिल जी

    anilkumar के द्वारा
    February 1, 2014

    आदरणीय निशा जी , आप की प्रतिक्रिया ने मेरा मनोबल बढा दिया । बहुत बहुत धन्यवाद ।

    Tessica के द्वारा
    October 17, 2016

    Dude, right on there brehotr.

    Maverick के द्वारा
    October 17, 2016

    This was so helpful and easy! Do you have any arlcties on rehab?

ranjanagupta के द्वारा
January 27, 2014

बहुत यथार्थमय वर्णन !अनिल जी बहुत बहुत बधाई !!

    anilkumar के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीय रंजना जी , उत्साह वर्धन के लिये , बहुत बहुत धन्यवाद ।


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