vechar veethica

सम्भावनाओं से समाधान तक

30 Posts

222 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1178 postid : 867976

कुछ बात है हममें जो हस्ती मिटती जा रही हमारी

  • SocialTwist Tell-a-Friend

किसी निराश हताश समाज को उसके गौरवपूर्ण अतीत का स्मरण करा कर उसका मनोबल बढ़ाना तो उचित है , परन्तु उस गौरवपूर्ण अतीत पर आत्ममुग्ध हो यथार्थ से विमुख हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण है । भारतीय समाज जिसे कभी गुलामी की हताशा से उबारने के लिये बुद्धिजीवियों , कवियों , शायरों ने उसके अतीत का स्मरण कराया था , वह आज तक उस पर आत्ममुग्ध है और दशकों से उसी के गौरव गान में निमग्न है , कि
” कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहां हमारा ।”
वर्तमान के संदर्भ में क्या यह वास्तव में सच है ? कभी जो भारतीय सांस्कृति का विस्तार सुदूर पूर्व में जावा , सुमात्रा , बाली आदि द्वीपों तक था । कभी जो भारतीय सांस्कृति हिन्दचीन में अंकोरवाट के मंदिरों से चीन और जापान तक आध्यात्मिकता का संदेश देती थी , आज वहां कम्बोडिया , लाओस , वियतनाम , थाईलेंड , मलेशिया , सिंगापुर आदि राष्ट्र आस्तित्व में आ चुके हैं । सुदूर पूर्व के जावा , सुमात्रा , बाली आदि द्वीप अब इन्डोनेशिया राष्ट्र के अंग हैं । कल तक जो भारत भूमि कहलाती थी , आज उस पर अफगानिस्तान , पाकिस्तान , बांग्लादेश , म्यमार और श्रीलंका आदि देशों का निर्माण हो चुका है । हम वास्तव में सिमिटते जा रहे हैं । मिटते जा रहे हैं । पर फिर भी गा रहे हैं और मान रहे है कि
” कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ”
हमने कभी सोचा ही नहीं कि हम क्या थे और क्या हो गए हैं ? क्यों हो गए और कैसे हो गए ? एक हजार वर्षों से अधिक की गुलामी का इतिहास , प्रमाण है कि युद्धों में हम विजयी कम और पराजित अधिक हुए हैं । हम अपनी हर पराजय का ठीकरा चन्द जयचन्द्रों एवं मीरजाफरों के सिर फोड़ कर संतुष्ट हो गये कि हम दूसरों से नहीं , अपनों से ही पराजित हुए हैं । हमने कभी सोचने की आवश्यकता ही नहीं समझी की जयचन्द्र और मीरजाफर सदैव हमारे ही पाले में क्यों पनपे ? दूसरों के पाले में हम कभी कोई मीरजाफर या जयचन्द्र क्यो नही खोज पाए । क्या हमारी पराजयों में गद्दारों की भूमिका के अतिरिक्त कुछ अन्य गंभीर कारण नहीं थे ?

इस संदर्भ में , कभी पढ़ा पानीपत के तीसरे युद्ध का एक प्रसंग याद आ रहा है । भयंकर रूप से उफनाती यमुना के एक ओर विशाल मराठा सेना निश्चिन्त थी , कि दूसरी ओर अहमदशाह अब्दाली का अपेक्षाकृत छोटा लश्कर यमुना पार कर आक्रमण नहीं कर सकता । वहीं अब्दाली आक्रमण के अवसर की सतत खोज में था । एक सुबह उसने यमुना पार मराठों की सेना में अनेक स्थानों से धुआं उठता देखा । उसने अपने भारतीय सूचना प्रदाता से कारण पूछा तो उसने बताया कि मराठा सेना में अलग – अलग जातियों के सैनिक अपने भोजन अलग – अलग बना रहे हैं । वे एक दूसरे का बनाया अथवा छुआ भोजन ग्रहण नहीं करते । यह सुन कर तब तक असमंजित अब्दाली विश्वास से भर उठा , और बोला जो कौम साथ भोजन कर नहीं सकती , वह कौम कभी साथ लड़ नहीं सकती । और जो कौम साथ लड़ नहीं सकती , वह कौम कभी जीत नहीं सकती । वही हुआ पानीपत के उस तीसरे युद्ध का परिणाम । मराठों की अत्यन्त शर्मनाक हार और हमारी गुलामी के एक और अध्याय का प्रारम्भ ।
क्या अब्दाली का वह कथन , हमारी निरंतर पराजयों के महत्वपूर्ण और गंभीर कारणों में से एक नहीं है ? और यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतिहास की इतनी ठोकरें खाने बाद भी यह जाति व्यवस्था , यह ऊँच – नीच , यह छुआ- छूत आज तक हमारे समाज की नस – नस में रची बसी है । किसी देश की शक्ति केवल सैनिकों से नहीं वरन् समग्र समाज की एकजुटता और सबलता से निर्धारित होती है । विघटित समाज न तो कभी सबल बन सकता है और न ही कभी समुचित विकास कर सकता है ।
अतः इस पर गंभीर चिन्तन नितान्त आपेक्षित है । क्या यह जाति व्यवस्था शास्त्र सम्मत है ? क्या यह वास्तव में हमारे तथाकथित धर्म का अंग है ? समस्त जगत , समस्त जड़ – चेतन , समस्त ब्रह्माण्ड के कल्याण का चिन्तन करने वाले हमारे अत्यन्त आध्यात्म सम्पन्न ऋषि-गण क्या इस प्रकार की संकीर्ण और विकृत व्यवस्था का निर्माण कर सकते थे ? तनिक विचार कीजिए यह जातियां हैं क्या ? स्वच्छकार , चर्मकार , स्वर्णकार , गडरिया , बहेलिया , तेली , मोची , माली , नाई , धोबी , कहार , निषाद , पनवाड़ी आदि आदि । यह सब व्यवसाय हैं । यह व्यवसाय श्रष्टि की रचना के साथ ब्रह्मा जी ने नहीं बनाए थे । यह तो समाज की आवश्यकता के अनुसार सृजित हुए थे , और मनुष्यों ने इन्हे अपनी आजीविका के लिए अपनाया था ।
निःसंदेह वर्ण-व्यवस्था शास्त्र सम्मत है । परन्तु वर्ण क्या हैं ? वर्ण न तो जाति हैं और न ही वंश । वर्ण का अर्थ है , रंग । किसी मनुष्य के व्यक्तित्व का रंग , अर्थात उस मनुष्य की मनोवृति । जैसे कोई एक व्यक्ति अन्तर्मुखी मनोवृति का हो सकता है , तो दूसरा वहिर्मुखी मनोवृति का । इसी प्रकार हमारे प्राचीन चिन्तक ऋषियों ने खोजा था कि मनुष्य की चार मौलिक मनोवृतियां हो सकती हैं । चिन्तनाभिमुख मनोवृति , संघर्षाभिमुख मनोवृति , अर्थाभिमुख मनोवृति एवं सेवाभिमुख मनोवृति । इन चारों मनोवृति धारियों के अपने-अपने महत्व और अपने-अपने सम्मान थे । ऋषियों की इस खोज का प्रयोजन समाज का कल्याण और समाज की व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने का था । इन मनोवृतियों के आधार पर किसी को उच्च एवं किसी को तुच्छ नहीं निर्धारित किया जा सकता । ऋषियों ने यह भी घोषित किया है कि मनुष्य अपनी मौलिक मनोवृति के उपरान्त भी अपने सम्पूर्ण जीवन काल में एवं दैनिक जीवन में भी समय-समय पर अन्य मनोवृतियों में संक्रमण करता रहता है । इसी के साथ यह भी व्यवहारिक रूप से स्पष्ट है कि किसी एक मौलिक मनोवृति के मनुष्य की समस्त सन्ताने आवश्यक नहीं कि उसी की मनोवृति की हों । वे उससे भिन्न मनोवृतियों की भी हो सकती हैं । उन्ही के अनुसार उनका उपयोग समाज के लिये हितकारी है ,ऐसा ऋषियों ने सुनिश्चित किया था ।
कालान्तर में भ्रमवश , अथवा अज्ञानता वश , अथवा काल की स्वभाविक गति से , अथवा कुछ अन्य अज्ञात करणों से वर्णों के अर्थ अपने मौलिक अर्थों से भटक गये और समाज में जाति और वंश के रूप में स्वीकृति पा गये । इससे समाज की समस्त व्यवस्था अतार्किक , असंगत एवं अन्यायपूर्ण हो गयी । इसके साथ ही विभिन्न व्यवसायों को भी जाति और वंश की मान्यता प्राप्त होने से यह विभ्रम और गहरा हो गया । समाज विघटित दर विघटित होता चला गया । समाज में उच्च एवं निम्न , सवर्ण एवं दलित , संचित एवं वंचित ,स्पर्शय एवं अस्पर्शय वर्गों का निर्माण हो गया । उनके परस्पर संघर्षों एवं हितों के टकराव से अत्यन्त अन्यायपूर्ण और अमर्यादित परम्पराओं का निर्माण हुआ । उदार चरित्रानाम ऋषियों ने जो व्यवस्था सम्पूर्ण मानव जाति के लिये निर्धारित की थी वह जातियों और वंशों के संजाल में उलझ कर , सम्पूर्ण मानव समाज तो क्या समस्त हिन्दू समाज को भी यथोचित और न्यायपूर्ण ढ़ग से पारभाषित एवं समायोजित करने में विफल हो गयी ।

सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि उत्तरवर्ती काल में वर्णों एवं व्यवसायों के मिथ्या अर्थों के परिपेक्ष्य में ही हमारे पवित्र धर्म-ग्रन्थों की व्याख्याएँ प्रस्तुत की गयीं । जिसके कारण आज उन पर मानवता विरोधी और असमानता एवं अन्याय के पोषक होने के आक्षेप लग रहे हैं ।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दू समाज में इतिहास के किसी मोड़ पर घटित इस गलती को अत्यन्त ईमानदारी से और तहे दिल से स्वीकार किया जाए और इसके परिष्कार का प्राण प्रण से प्रयत्न किया जाए । आज केवल देशभक्ति के गीत गाने या इन्कलाब के नारे लगाने से देश का उत्थान नहीं होगा । आज की सबसे बड़ी देशभक्ति और सबसे बड़ा इन्कलाब यह ही है कि हम अपने समस्त दुराग्रहों , अहंकारों , संकीर्णताओं , मिथ्या श्रेष्ठताओं , और विकृत परम्पराओं को तलांजलि दे कर एक समतामूलक एवं समरसता पूर्ण समाज का निर्माण करें । यह सब हमे अत्यन्त त्वरित गति से और प्राथमिकता के आधार पर करना होगा । अब यह मानना कि समाज धीरे धीरे बदलेगा , घातक होगा , क्यों कि समय अत्यन्त तीव्र गति से बदल रहा है और यदि हम उसके अनुसार नहीं बदले तो जो आज हम हैं , वह भी कल न रहेंगे । हम और सिमिट जाएंगे , और मिट जाएंगे और केवल गाते ही रह जाएंगे कि
” कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जहां हमारा ”

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

44 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Kayli के द्वारा
October 17, 2016

This piece was a lijkafceet that saved me from drowning.

Santlal Karun के द्वारा
April 28, 2015

आदरणीय अनिल कुमार जी, यह आलेख कई दृष्टियों से मौलिक है | यह बड़े ही तथ्यात्मक, वैचारिक, तर्कपूर्ण और सूक्ष्म गवेषणा के साथ लिखा गया है | इस लघु कायिक लेख ने भारत और भारतीयता की कश्मीर से कन्याकुमारी और कामरूप से कच्छ की खाड़ी तक फैले जन-जन के मन-मानस में मीठे ज़हर की तरह व्याप्त जातिगत अहंकार के अस्तित्व की कलई उतार कर सख़ दी है | इस प्रभावशाली, शस्त्रमुखी लेख़ के लिए सहृदय साधुवाद एवं ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ के चयन पर हार्दिक बधाई !

    anilkumar के द्वारा
    May 1, 2015

    आदरणीय संतलाल जी । लेख पर आपकी प्रभावशाली टिप्पणी , लेख की सार्थकता का  प्रमाण-पत्र है । बहुत बहुत आभार । 

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
April 28, 2015

आदरणीय अनिल जी , अभिवादन व साप्ताहिक सम्मान के लिए बधाई । लेख के बारे मे आपको पहले ही अपने विचारों से अवगत करा चुका हूं । बहुत सुंदर और यथार्थपरक विश्लेषण किया है आपने । अक्सर लोग देश्प्रेम की भावना से ही देखते और लिखते हैं लेकिन सच काफी बदल चुका होता है । आपने बहुत सटीक बातों की तरफ ध्यान खींचने का प्रयास किया है । इस अच्छे लेख के लिए पुन: बधाई ।  सादर, सप्रेम ।

    anilkumar के द्वारा
    April 28, 2015

    प्रिय विष्ट जी , आपने एक बार फिर ब्लाग पर आ कर और लेख की प्रशंसा कर के एवं बधाई  दे कर मुझको अत्याधिक उपकृत किया है । आपको पुनः बहुत बहुत धन्यवाद । 

    Reegan के द्वारा
    October 17, 2016

    Was totally stuck until I read this, now back up and ruginnn.

pkdubey के द्वारा
April 27, 2015

आदरणीय सर जी ,बहुत गहन चिंतन से परिपूर्ण आलेख ,सादर .

    anilkumar के द्वारा
    April 28, 2015

    प्रिय दुबे जी , लेख को पढ़ने और प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिये बहुत बहुत आभार । 

brijeshprasad के द्वारा
April 27, 2015

प्रिय अनिल जी, पहली बार आप के विचारों से साक्छात्कार हुआ। अत्यंत विचारणीय विषय। हम समय के साथ नहीं चल सके। हमारे समृद्ध एवं वैभवशाली अतीत ने हमें अकर्मणीय बना दिया। परिणामो एवं कारणों की सुन्दर व्याख्या की है आप ने। धन्यवाद।

    anilkumar के द्वारा
    April 28, 2015

    प्रिय बृजेश जी , आपका ब्लाग पर स्वागत है । विचारों से अनुकूलता का अभिव्यक्ति , आप से  और अधिक निकटता का एहसास करा रही है । बहुत बहुत आभार । 

drashok के द्वारा
April 26, 2015

श्री अब्दाली का उदाहरण देकर हमारी जाती व्यवस्था से होने वाले नुकसान पर बहुत अच्छा प्रकाश डाला है बहुत अचा लेख डॉ अशोक

    anilkumar के द्वारा
    April 28, 2015

    आदरणीय डॉ अशोक जी , आपने मेरे ब्लाग पर आ कर और लेख पर प्रतिक्रिया दे कर अनुग्रहित  किया । बहुत बहुत आभार । 

jlsingh के द्वारा
April 26, 2015

सपतहिक सामान की बधाई आदरणीय अनिल कुमार जी!

    anilkumar के द्वारा
    April 28, 2015

    प्रिय जवाहर लाल जी , बहुत बहुत धन्यवाद । 

sadguruji के द्वारा
April 26, 2015

आदरणीय अनिल कुमार जी ! इस अतिउत्तम और विचारणीय लेख के लिए और ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! आपका लेख कई दिन पहले पढ़ लिया था, परन्तु मंच की तकनिकी दिक्कत के कारण कमेंट जा नहीं रहा था ! आपने बिलकुल सही कहा है कि वो विशाल हिन्दुस्तान अब है कहाँ ! हमारी हस्ती तो दिनप्रतिदिन सिमटती ही जा रही है ! दरअसल अब लोग राम-रावण, कृष्ण-कंस और युद्धिष्ठर-दुर्योधन का दोहरा चरित्र जी रहे हैं ! भारतीय संस्कृति और अखंडता के समर्थक ही दोहरा आचरण कर उसे रसातल में पहुंचा रहे हैं ! शुभेक्षा और शुभकामनाओं सहित-सद्गुरुजी !

    anilkumar के द्वारा
    April 28, 2015

    आदरणीय राजेन्द्र जी , आप ने मेरे लेख को पढ़ा और उसमें निहित विचारों से सहमति व्यक्त की । उसके लिये और आपकी शुभेक्षाओं एवं शुभकामनाओं के लिये बहुत बहुत आभार । 

sudhajaiswal के द्वारा
April 22, 2015

आदरणीय अनिल जी, बहुत ही बढ़िया विचारणीय लेख के लिए बधाई|

    anilkumar के द्वारा
    April 26, 2015

    धन्यवाद , सुधा जी । 

yamunapathak के द्वारा
April 21, 2015

aadarneey anil jee sach hai ghar ho ya desh ekata bahut zarooree hai. sabhar

    anilkumar के द्वारा
    April 21, 2015

    आदरणीय यमुना जी , ब्लाग पर पधारने और विचार व्यक्त करने के लिए धन्यवाद ।

    Jayna के द्वारा
    October 17, 2016

    Thiinkng like that shows an expert at work

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
April 20, 2015

आदरणीय अनिल जी, अभिवादन तथा इस अच्छे लेख के लिए आपको हार्दिक धन्यावाद । बहुत मगन होकर यह लेख पढा । बहुत ही जानकारीपूर्ण लेख है और आपने सही कहा कि हमने कभी सही तरीके से विश्लेषण किया ही नही । आज भी वही रटी रटाई बातों का जप कर रहे हैं । बिल्कुल सही कहा आपने और मैं भी सहमत हूं कि कुछ बात है हममें जो हस्ती मिटती जा रही हमारी।

    anilkumar के द्वारा
    April 21, 2015

    प्रिय विष्ट जी , लेख के अवलोकन और विचारों के समर्थन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद । 

jlsingh के द्वारा
April 19, 2015

आदरणीय श्री अनिल कुमार महोदय, सादर अभिवादन! आपका यह आलेख नहीं महत्वपूर्ण है बल्कि आँख खोलनेवाला है. …अगर अब भी हम न चेते तो परिणाम या कहें दुष्परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा. दरअसल हमारे समाज का फूट ही वह कारन है जिसके कारन हम हजारों साल गुलाम रहे और आजादी के ६७ साल बाद भी अपेक्षित प्रगति नहीं का पाये हैं आज भी विभिन्न राजनीतिक दल हमें तोड़कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं… सादर!

    anilkumar के द्वारा
    April 20, 2015

    प्रिय जवाहरलाल जी , लेख में विचारों के मर्म को स्पर्श करने के लिये आभार । वास्तव में जब तक  समग्र समाज प्रगति नहीं करेगा , तब तक देश आपेक्षित प्रगति नहीं कर पाये गा । 

harirawat के द्वारा
April 19, 2015

अनिल कुमार जी सबसे पहले मैं आपका साधुवाद करता हूँ की आप भूले भटके मेरे ब्लॉग में आए, और मेरा हौसला अफजाई करने के लिए आपने सुन्दर सी टिप्पणी छोड़ दी ! आपने भारतीय संस्कृत पर अपने विचार प्रकट करके बड़ा सराहनीय काम किया है ! बदलते प्रवेश में आपकी चिंता जायज है ! अध्यात्म की छतरी का सहारा लेते हुए नकली आश्रम, नकली सन्यासी कुक्करमुत्ते की तरह पनप रहे हैं फिर भी अनपढ़ गरीबों को तो अपने रोटी की चिंता है पर मध्य श्रेणी के संभ्रांत लोग इन कपटी साधू संतों के चक्रव्यू में फंस कर लूटते जाते हैं, पर अंधविश्वास की पट्टी आँखों से हटती नहीं और हमें भी मजबूर कर देते हैं यह कगते हुए की “कुछ बात है की हस्ती मिटी नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर ये जहां हमारा ” ! अति सुन्दर लेख दे लिए बधाई ! हरेन्द्र

    anilkumar के द्वारा
    April 19, 2015

    आदरणीय हरेन्द्र जी , लेख को पढ़ कर , उस पर अपना वैचारिक सहयोग देने के लिये आभार । 

    Kaycee के द्वारा
    October 17, 2016

    This piece was cogent, weritwllt-en, and pithy.

Shobha के द्वारा
April 16, 2015

बहुत अच्छा लेख आपने अपने लेख में कई में प्रश्न उठाये हैं बहुत ही उपयोगी ज्ञान वर्धक लेख डॉ शोभा

    anilkumar के द्वारा
    April 18, 2015

     आदरणीय डॉ , शोभा जी , लेख के अवलोकन एंव प्रशंसा के लिए धन्यवाद ।

rameshagarwal के द्वारा
April 16, 2015

जय श्री राम बहुत सटीक और यथार्थ से पूर्ण लेख है.हमारी सबसे बड़ी कमजोरी आपसी द्वेष और अहंकार हैं.हम लोग स्वार्थी है और अपने मतलब के लिए दुसरे का नुक्सान करने से भी नहीं डरते.हमारी अवन्ती का सबसे बड़ा यही कारण है.भगवान् ने हमें सब कुछ दिया परन्तु हम फैयेदा नहीं उठा सके.ये लेख भी हम लोगो की मानसिकता को बदल सकेगा.

    anilkumar के द्वारा
    April 18, 2015

    प्रिय रमेश जी , लेख में व्यक्त विचारों से सहमति के लिए आभार । 


topic of the week



latest from jagran