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सम्भावनाओं से समाधान तक

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anilkumar


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बेटों को भी कुछ पराया होने की स्वतंत्रता दीजिये

Posted On: 19 Jul, 2012  
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राष्ट्रपति पद की मर्यादाये दांव पर – Jagran Junction Forum

Posted On: 27 Jun, 2012  
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बाबा रामदेवजी से विनम्र निवेदन

Posted On: 29 Mar, 2011  
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Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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क्या हम फिर छन्नी में दुहें गे ?

Posted On: 3 Mar, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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अनिल कुमार जी सबसे पहले मैं आपका साधुवाद करता हूँ की आप भूले भटके मेरे ब्लॉग में आए, और मेरा हौसला अफजाई करने के लिए आपने सुन्दर सी टिप्पणी छोड़ दी ! आपने भारतीय संस्कृत पर अपने विचार प्रकट करके बड़ा सराहनीय काम किया है ! बदलते प्रवेश में आपकी चिंता जायज है ! अध्यात्म की छतरी का सहारा लेते हुए नकली आश्रम, नकली सन्यासी कुक्करमुत्ते की तरह पनप रहे हैं फिर भी अनपढ़ गरीबों को तो अपने रोटी की चिंता है पर मध्य श्रेणी के संभ्रांत लोग इन कपटी साधू संतों के चक्रव्यू में फंस कर लूटते जाते हैं, पर अंधविश्वास की पट्टी आँखों से हटती नहीं और हमें भी मजबूर कर देते हैं यह कगते हुए की "कुछ बात है की हस्ती मिटी नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर ये जहां हमारा " ! अति सुन्दर लेख दे लिए बधाई ! हरेन्द्र

के द्वारा: harirawat harirawat

आदरणीय शोभा जी ऐसा प्रतीत होता है कि आप कहीं विदेश में किसी विकृत तानाशाही की प्रत्यक्षदर्शी रहीं हैं । मै आपकी मनःस्थिती समझ सकता हूँ । आपने जिस भयावहता का अनुभव किया होगा , उसका हमलोग केवल अनुमान ही लगा सकते हैं । ईश्वर न करे , कभी आपको , हमको या अपने देश को कभी भी ऐसी परिस्थिति का सामना करना पडे । मेरा यह लेख मुख्यतः अपने देश के संदर्भ में था । इस लिए मैने निवेदन किया था कि किसी भी परिस्थिति का सामान्यीकरण नहीं करना चाहिए । प्रत्येक परिस्थिति के दो पक्ष होते हैं । हमको पूर्वाग्रही हो कर सकारात्मक पक्ष की सम्भावना को नकारना नहीं चाहिए । हम सबको बेशक सतर्क रहना चाहिए , परन्तु न तो स्वयं आतंकित होना चाहिए और न ही किसी को आतंकित करना चाहिए । आपने मेरा यह लेख पढा और उस पर अपना प्रतिक्रिया दी उसके लिये आपका बहुत बहुत आभार ।

के द्वारा: anilkumar anilkumar

के द्वारा: anilkumar anilkumar

के द्वारा: yatindrapandey yatindrapandey

जब किसी व्यक्ति की संवेदनाओं का आवर्त्तन , किसी अन्य मनुष्य अथवा जीव की संवेदनाओं के अनुरूप हो जाता है , तब यह व्यक्ति , उस अन्य व्यक्ति अथवा जीव के सुख या पीड़ा से आनंदित अथवा व्यथित होता है | इस ही प्रकार जब किसी व्यक्ति की संवेदनायों के सपंदन , समस्त सृष्टि की संवेदनाओं के सपंदनों के साथ एकाकार हो जाते हैं , तब उस स्थिति को ही निर्वाण कहते हैं , और जो व्यक्ति उसको प्राप्त करता है , वह बुद्ध हो जाता है | संस्मरण की ये पंक्तियाँ अच्छी लगी.इसके लिए बधाई.जहांतक प्रेतों कि बात है तो निसंदेह उनका अस्तित्व है,मैंने उन्हें देखा है और वो भी जीवन के उस काल में जब मैं नास्तिक था और कम्युनिस्ट विचारधारा को मानता था.प्रेत होते हैं,ये बात अलग है कि कोई उन्हें देख पता है और कोई नहीं देख पाता.तुलसीदास जी को भी प्रेतों के दर्शन हुए थे और कई संतों को मैं भूत-प्रेतों से काम लेते देखा.कांटेस्ट के लिए मेरी शुभकामनायें.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: yatindrapandey yatindrapandey

उन पलों से मैने भूतों के आस्तित्व की तार्किक अस्वीकृति सीखी | अब मैं जानता हूँ , कि किसी को भूत क्यों और कैसे दिखाई देते हैं | जब किसी प्रकार का अथवा अनेक प्रकार के भय घनीभूत हो कर मनुष्य के सुसुप्त मस्तिष्क एवं अंतःकरण मैं कहीं गहरे अवस्थित हो जाते हैं , वह ही भय मनुष्य के किन्हीं अति दुर्बल मानसिक पलों में , विभिन्न आकार ले कर प्रकट हो सकते हैं | जिनको लोग भूत समझते हैं | उन पलों से मैने सीखा , कि तानसेन जब गाते थे , तब उनके पास रखे वाद्य यंत्रों का स्वतः ही बज उठना , मिथ नहीं सत्य था | यदि वाद्य यंत्रों को गेय स्वरों की आवृति में ट्यून किया जाये , तो यह सम्भव है | केवल दो तार ही क्यों , किन्हीं दो ह्रदयों की तंत्रिकाएं भी यदि एक ही आवृति में ट्यून होजाएं , तो वह भी एक साथ ही झंकृत होती हैं | सही और गलत में भेद कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है ! किन्तु जब प्रत्यक्ष होता हो तो हमारा दर दूर हो जाता है ! बढ़िया संसमरण लिखा है आपने !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आदरणीय अनिल जी, आप के इन संकल्पों से मन में अजीब-सी प्रतिक्रिया हुई | दर असल कम लिखने की समस्या मेरी भी है | आप का दर्द समझ सकता हूँ -- "मैं मात्र इतना ही संकल्प करता हूँ , कि वर्ष २०१४ में ,मैं नियमित रूप से प्रति माह कम से कम दो ब्लॉग पोस्ट अवश्य लिखुगा | मैं कोशिश करूंगा कि इस वर्ष मेरे ब्लॉग पोस्टों कि संख्या ५० के पार अवश्य पहुचे | कुछ लोगों के लिए यह हास्यासपद हो सकता है , परन्तु मेरे लिए यह ही महत्वपूर्ण है | अब रही बात कि इस संकल्प को मैं पूरा कैसे करूंगा | इस राह मेँ मेरी सबसे बड़ी बाधा , मेरा कम्प्यूटर और उसकी तकनीकों के पर्याप्त ज्ञान का आभाव है | इस आभाव को मैं समुचित प्रशिक्षण और सतत अभ्यास के द्वारा दूर करने का निश्चय करता हूँ | इसके अतिरिक्त मैं अनुभव करता हूँ , कि संकल्प को पूरा करने के लिए मुझको अपनी अंतर्मुखी प्रवृति से बाहर आना होगा | पुस्तकों के अतिरिक्त मनुष्यों का अध्ययन करना होगा | मैं इसकी कोशिश करूंगा |" नव वर्ष की मंगल कामनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

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के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

अब आवश्यकता है कि कोई राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री अथवा अर्थशास्त्र का राष्ट्रवादी शोधार्थी हमारे उस स्वर्णिम भारत कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर शोध करे , आचार्य चाणक्य के अर्थशास्त्र का गहन अध्ययन करे और फिर अपने देश के लिए नये अर्थशास्त्र का निर्माण करे , जो ग्राम आधारित हो , जो कृषि आधारित हो I क्यों कि अभी भी भारत गावों में ही बसता है I हमको वोह नया अर्थशास्त्र चाहिए , जिसमे विज्ञानं , तकनीक और प्रद्योगिकी कि प्राथमिकतायें गांवों और गांवों कि आवश्यकताएं हों I नगर गांवों के लिए हों I वोह अर्थशास्त्र चाहिए जिसमे मानव श्रम का सम्मान हो , जिस में मनुष्य की मेघा का अभिनन्दन हो I वोह अर्थशास्त्र जिसमे संयम के साथ उपभोग की व्यवस्था हो I वोह अर्थशास्त्र जो शोषण पर नहीं पोषण पर आधारित हो I वोह अर्थशास्त्र जिसमे सबका सम्यक विकास संभव हो I वोह अर्थशास्त्र जिसमे विकास जी. डी. पी. से नहीं मनुष्य की खुशहाली से मापा जाये I वोह अर्थशास्त्र जिसमे भारत की सांस्कृति और अस्मिता न केवल सुरक्षित रहे ,,,,,,,,,,बहुत अच्छे भाव लिये एक अच्छी प्रस्तुति के लिये बधाई

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

अनिलजी सबसे पहले मैं आपका मेरे ब्लॉग में आकर मेरी कविता पर अपने स्नेह की छाप लगा कर मेरा हौसला अफजाई किया है उसके लिए मैं आपका दिल से धन्यवाद करता हूँ ! आपने "एक नया अर्थ शास्त्र चाहिए" नामक शीर्षक से देश के शुभ चिंतकों के लिए इस विषय पर विचार करने का रास्ता खोल दिया है, कदम सराहनीय है ! जिस समय चन्द्र गुप्त मौर्य के गुरु प्रधाम मंत्री और उस जमाने के महान भारतीय ग्रंथों की समीक्षा करने वाले, फिलोसफ़र, अर्थशास्त्री, राजनीतिग्य आचार्य चाणक्य जिन्हें इतिहास में कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता है, के द्वारा लिखा गया अर्थ शास्त्र वास्तव में उस जमाने का सविधान ही था ! भारत में पहली बार अर्थशास्त्र नाम से यह सविधान लिखा गया था जो आज भी सजीव विश्व की राजनीति और अर्थशास्त्र नामक वट वृक्ष की गहराई तक जाने वाली जड़ें हैं ! लेख अर्थपूर्ण सारगर्भित प्रेरणा दायक है, बधाई !

के द्वारा: harirawat harirawat

अनिल जी, नमस्कार, व्यक्तित्व की पूर्ण विकास के लिये कुछ स्वतन्त्रता का अधिकार तो सभी को है... चिडिया भी बच्चों को तभी तक साथ रखती है जब तक वह उडना नहीं सीख जाते..यही अन्य पशु पक्षियों पर भी लागू होता है. मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो हर वस्तु पर पूर्ण अधिकार की कामना रखता है चाहे वह घर हो... पति या पत्नी हो या फ़िर बच्चे हों. यदि बेटे और बेटी में विवेक होगा, वह स्वतन्त्र निर्णय लेने लायक होंगे तो शायद सही निर्णय ले पायेंगे. प्रत्येक मनुष्य को रिश्तों का सम्मान करना चाहिये और हर रिश्ते की मर्यादा को निभाना जरूरी है... शादी से पहले भी और शादी के बाद भी.... विचारों को साझा करने के लिये आभार... लिखते रहिये.

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

मित्रो वर्ष 2014 आने दीजिये बाबा के सर से भी राजनीती का भूत उतर जायेगा - क्योंकि भारत की 120 कोटी जनता आप के साथ है । ऐसा ख़्वाब पालने से अच्छा है की वर्तमान में ही जिया जाय और वास्तविकता का समझा होगा क्योंकि जब चुनाव होते है तो उसमे 40 से 60 प्रतिशत लोग ही भाग लेते है और वह भी विभिन्न दलों के समर्थक होते है --- शायद आप जैसे बुद्धिमान व्यक्ति ही हिसाब लगा कर बाबा को बताते है की भारत की 120 कोटी जनता उनके साथ है और बाबा का दिमाग भी चौथे आसमान पर पहुच जाता है-- जहाँ तक भारत के विश्व शक्ति और विश्व गुरु बनाने की बात है वह तो बनेगा ही वह कर्मठ कामगारों मेहनत के निर्माण / परिश्रमी वैज्ञानिकों की खोज /कुशल प्रशासकों की व्यस्थाओं के द्वारा ही संभव है न की सन्यासी का चोला बदल कर नेता बन जाने से इस देश का भला होगा - देश का उद्धार अगर नेताओं के द्वारा होना होता तो अब तक हो गया होता क्योंकि ऐसा नहीं है की इमानदार नेताओं कमी है या थी -- एस.पी.सिंह,मेरठ

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